मोदी और योगी को परख चुके किसान

मोदी और योगी
परिणाम लोग देख चुके हैं अब चुनावों में जनता भी फैसला दे देगी.

मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में किसानों की नाराजगी का शिकार होकर सत्ता गंवाने वाले भाजपा के नेता किसानों को छलने से बाज नहीं आ रहे। उत्तर प्रदेश में केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के नेता किसानों और गरीबों को केवल छल्लेदार बयानबाजी से फुसलाने में लगे हैं। सरकारी खजाने का एक बड़ा हिस्सा योगी और मोदी सरकार के भ्रमात्मक प्रचार पर बरबाद किया जा रहा है। इन विज्ञापनों में दावे यहां तक किए जा रहे हैं कि मानो भाजपा सरकारों ने यहां किसानों की तकदीर ही बदल दी हो।

किसानों के बिजली बिल पिछले साल दोगुना कर दिए गये। दावा किया गया था कि किसानों को 24 घंटे बिजली मिलेगी लेकिन बिल बढ़ाने के बाद बिजली उतनी ही मिल रही है। दावा किया गया कि गन्ना भुगतान दस दिनों में किया जायेगा। जबकि चुनावी मौसम में भी दो माह बीतने पर भुगतान हो रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के किसानों का इस सत्र का बकाया बीस करोड़ को भी पार करने वाला है। कई मिलों ने अभी तक पिछले सत्र का भी बकाया अदा नहीं किया। सरकार मिल मालिकों पर दबाव बनाने के बजाय उन्हें कई बार रियायतें दे चुकीं जिसमें करोड़ों के पैकेज के अलावा चीनी पर दो सौ रुपये हाल ही में मूल्य वृद्धि की है। मिलों को दिए जा रहे बार पैकेज को किसानों की राहत बताया जाता है जबकि लाभ मिलों को मिल रहा है। कितनी मजेदार बात है कि इसके बावजूद मिल किसानों का भुगतान करने में दिलचस्पी नहीं ले रहे।

हाल ही में छोटे किसानों को चुनावी लाभ के लिए दो हजार नकद सहायता को, जो अभी मिली भी नहीं, छह हजार बताकर वाहवाही शुरु कर दी गयी है। तमाम कृषि यंत्रों पर जीएसटी थोपकर, पेस्टीसाइड और बीज महंगे कर उनसे इससे कई गुना वसूली कर ली गयी है। पशु पालन सरकारी नीतियों से घाटे का सौदा हो गया। इससे दुग्ध व्यवसाय को जहां झटका लगा है, वहीं खेती को प्राप्त होने वाली गोबर की खाद की भी कमी हो गयी है। जैविक खाद के उपयोग का शोर मचाया जा रहा है और उसके स्रोत को खत्म करने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना दिया जा रहा है। जबकि किसानों को पता है कि उनकी लागत कितनी बढ़ गयी और मूल्य उसके बरक्स बहुत कम है। झूठे प्रचार से इस बार काम नहीं चलेगा। परिणाम लोग देख चुके हैं अब चुनावों में जनता भी फैसला दे देगी।

~जी.एस. चाहल.

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