बेरोज़गार युवाओं के देश की तरक्की के सपने

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उद्योगों को कर छूट देकर और बैंकों को ऋण बांटने को ऋण-मेले लगाने का क्या लाभ?.
या तो देश के कर्णधार और नीति निर्धारक आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश की बीमारी को समझ नहीं पा रहे अथवा वे जानबूझकर देश के चंद ताकतवर लोगों के हाथ का खिलौना बन गए हैं। आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह देश के 65 करोड़ युवाओं को रोजगार उपलब्ध न होना है। जिस देश का कमाऊ वर्ग (युवा शक्ति) खाली हाथ बैठने को मजबूर होता जायेगा, उस देश की बरबादी अवश्यम्भावी मानिये। अब नवयुवक केन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की योगी सरकार से निराश होते जा रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है जो दोनों को उम्मीदों के साथ सत्ता तक लाए तथा अब स्वयं को कोस रहे हैं।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और रिजर्व बैंक के गर्वनर शक्तिकांत दास सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के जो प्रयास और घोषणायें कर रहे हैं उनसे स्थिति में बदलाव नहीं होने वाला। उद्योगों को कर छूट देकर और बैंकों को ऋण बांटने को ऋण-मेले लगाने का क्या लाभ? कहा जा रहा है इससे माल सस्ता होगा साथ ही नये-नये उद्योग लगेंगे। आम आदमी कर्ज लेगा तो वह भी अपना कारोबार बढ़ायेगा।

किसी ने कहा था कि टका ऊंट बिक रहा है ले लो, उत्तर मिला कि टका ही नहीं है तो भला ऊंट कैसे लें? सरकारी अर्थवेत्ता जानते होंगे कि उपभोक्ताओं की जेब खाली है तो कंपनियों का माल कैसे खरीदें? सस्ता हो या महंगा कोई फर्क नहीं।

सरकार ऋण पर मामूली ब्याज कम कर कर्ज की बात कर रही है। जब कारोबार ही नहीं तो कर्ज अदा कैसे होगा? पहले से कारोबार करने वालों का माल ही नहीं उठ रहा। वे कारोबार बढ़ाने को कर्ज लेकर क्या करेंगे। ऑटो सेक्टर में कई-कई दिन काम बंद किया जा रहा है। उनकी पहली मशीनें ही बंद पड़ी हैं। कर्मचारियों को वेतन भी कटौती के साथ दिया जा रहा है। ऐसे कारोबारी पिछला कर्ज देने में ही असमर्थ हैं। वे और कर्ज लेकर क्या करेंगे।

नोटबंदी और जीएसटी का गलत निरधारण तथा सरकारी विभागों में रिक्तियों के बावजूद नियुक्तियां न करना देश की अर्थ व्यवस्था को ध्वस्त करने का बड़ा कारण है। इससे जहां छोटे उद्योग भारी संख्या में बंद हुए। उनका कुप्रभाव बड़े उद्योगों पर भी धीरे-धीरे पड़ता गया। उधर किसानों और मजदूरों की आय लगातार कम होती जा रही है। यह देश का सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। घटती आय से इस वर्ग ने बाजार की ओर जाना छोड़ दिया।

डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के दस वर्षों में ग्रामीण भारत जहां देश की 70 फीसदी आबादी बसती है, में मोबाइल फोन, बाइक, फ्रिज तथा कारों के साथ वस्त्र, साबुन, सौन्दर्य प्रसाधन तथा ट्रैक्टर और कारों की मांग कितनी बढ़ी थी। आंकड़े उठाकर देख लें। जो चीजें बीसवीं सदी में शहरों तक सीमित थीं उनकी मांग इन दस वर्षों में गांवों तक हो गयी थी। मोदी सरकार के पांच वर्षों में ग्रामीण भारत की क्रिय शक्ति लगातार घटती जा रही है। निकट भविष्य में सुधार की उम्मीद कहीं तक नजर नहीं आती देश की विकास दर का अनुमान मौजूदा वित्त वर्ष के लिए कम करना भी यही संकेत देता है। आरबीआई गर्वनर और वित्तमंत्री दोनों ही हालांकि स्थिति पर संतोष व्यक्त कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश बहुत तेजी से आर्थिक मोरचे पर बढ़ता नज़र आ रहा है।

-जी.एस. चहल.

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