बीमारी अमीरों को और मौत गरीबों को

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बेमौत मरने वालों की पूरे देश में कितनी संख्या है या होगी, इसके आंकड़े देने वाला कोई नहीं.
आज कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरा विश्व भयाक्रांत है। इसे नियंत्रित करने की कोशिश के साथ इस महामारी के उन्मूलन के प्रयास किए जा रहे हैं। बड़े लोगों से देश में आई इस बीमारी का खतरा आम आदमी के लिए भी शुरु हो चुका। देश में मच रहे शोर और तालाबन्दी का काम चन्द बड़े लोगों की सुरक्षा से ही जुड़ा है। उन्हें सुरक्षित करने के लिए न जाने कितने आम लोगों की जान चली गई और अभी न जाने कितने गरीबों को धनी लोगों की इस खामी का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। नहीं कहा जा सकता कितनी मौतें चन्द लोगों को सुरक्षित बचाए रखने के लिए होंगी।

कारोना से संक्रमित लोगों की संख्या देश में हजार के पार पहुंच चुकी। यह कोई आंकड़ा नहीं इस बीच इन्हें बचाने के लिए कितने दूसरे लोग मर गये। साथ ही निकट भविष्य में भूख और गरीबी तथा सिस्टम की नाकामी से कितने गरीब बच्चे, महिलायें तथा पुरुष समय पूर्व मौत के मुंह में समा जायेंगे। देश की माली हालत का जो बदहाल स्वरुप देखने को मिलेगा अभी उसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े होने लगते हैं।

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दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरु, गुरुग्राम, जयपुर समेत अधिकांश महानगरों से देश में जारी तालाबंदी से करोड़ों मजदूर देश के दूर-दराज गांवों के लिए पलायन कर रहे हैं। भूख और भविष्य के भय ने उनके कदम सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर कर दिए हैं। उनके मतों से सत्ता तक पहुंचे लोगों के पास ट्रेनें, बसें, कारें तथा हवाई जहाजों की कमी नहीं लेकिन इन गरीबों को घर तक पहुंचाने के लिए इन्हें उपलब्ध कराने की जरुरत नहीं। अमीरों के लिए विदेशों में विमान भेज दिए गये। उनके लिए तमाम सरकार और प्रधानमंत्री चिंतित हो गये। बच्चों को कंधों पर और सामान को पीठ और सिर पर लादे गरीबों को बसें तक चलाने में परेशानी आई। जिन सड़कों पर अमीरों की कारें फर्राटें भरती हों, उन पर गरीबों को नंगे पांव पैदल घिसटते देख पीएम हों या सीएम सभी आनंदित हैं। बीमारी अमीरों को और मौत गरीबों की -धन्य हैं देश के कर्णधार। दिल्ली से मुरादाबाद तक आते-आते इनमें से लगभग एक दर्जन लोग एक दिन में ही घर पहुंचने से पहले बेमौत मारे गये। बेमौत मरने वालों की पूरे देश में कितनी संख्या है या होगी, इसके आंकड़े देने वाला कोई नहीं। जबकि लंबे समय तक बेरोजगार हुई एक बड़ी आबादी में से भूख और बदहाली से आगे कितनी मौतें होंगी उसका अनुमान लगाना भी नामुमकिन है। सड़कों पर पैदल रेंग रहे लोगों का कहना है कि जब लंबे समय तक सब कुछ बंद करना था तो पहले से क्यों नहीं बताया? कम से कम वे घर तो सवारियों से पहुंच जाते।

~जी.एस. चाहल.