लॉकडाउन का औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर

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हज़ारों श्रमिक घर बैठे, कारोबारी व दैनिक मज़दूर आर्थिक बदहाली के शिकार
औद्योगिक नगरी गजरौला में कोरोना संकट के चलते जहां कई उद्योग पूरी तरह तथा कई आंशिक बंदी की मार झेल रहे हैं, वहीं उद्योगों में सेवारत हजारों कर्मचारी और मजदूर बेरोजगारी के दंश की मार से पीड़ित हो घर बैठ गये हैं। हजारों परिवारों की रोजी इससे परोक्ष रुप में खतरे में पड़ गयी है। नगर के तमाम दुकानदार, ट्रांस्पोर्टर, रिक्शा चालक, होटल और ढाबा मालिकों के साथ यहां काम करने वाले खाली बैठ गये हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग जहां दिन रात वाहनों की आवाजाही रहती थी और राजकीय राजमार्ग जहां नगर तथा बाहर के वाहनों का भारी जमावड़ा रेंगता या दौड़ता दिखता था अब लगभग सुनसान नज़र दिखती है। बंद पड़ी दुकानों और सुनसान सड़कों को देखकर लगता है कि यहां के लोग कहीं गुम हो गये हैं। दिन ढलते ही माहौल बिल्कुल सुनसान हो जाता है।

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सबसे बड़ी औद्योगिक इकाई जुबिलेंट लाइफ साइंसेज लि. के जनसंपर्क महाप्रबंधक सुनील दीक्षित ने बताया कि बहुत जरुरी दवायें बनाने वाले प्लांट ही चालू हैं। अधिकांश प्लांटों में काम बंद है। दीक्षित के मुताबिक पच्चीस फीसदी कामगार ही काम कर रहे हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि नगर के तमाम उद्योगों में सेवारत अधिकांश कर्मचारी और मजदूर फिलहाल घर बैठ गये हैं।

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टेवा एपीआई यहां की दूसरी बड़ी इकाई है। यहां भी यही हाल है। दोनों जगह कंपनी के स्थायी कर्मचारी जहां बड़ी संख्या में खाली बैठे हैं। वहीं आउटसोर्सिंग के जरिए काम कर रहे कर्मचारी लगभग 90 फीसदी तक बाहर कर दिए गये हैं। आर.एसी.एल. गेयरटेक लि., इंश्लिको लि., उमंग डेयरीज़, कौशाम्बी पेपर मिल, कामाक्षी पेपर्स, ए.एस.पी. तथा कोरल न्यूज़ प्रिंट आदि फैक्ट्रियों में इससे भी बदतर हाल में इनमें से अधिकांश कर्मचारी अस्थायी छुट्टी पर हैं। दिहाड़ी मजदूर तो पहले ही परेशान थे। बड़े लोगों पर हुए कोरोना आक्रमण की मार ऐसे लोगों पर बिना वायरस संक्रमण के ही पड़ गयी। पता नहीं कब तक उन्हें राहत का इंतज़ार करना होगा।

गजरौला के उद्योगों में सेवारत दस हजार से अधिक परिवारों के कमाऊ सदस्य घर बैठ चुके जबकि परोक्ष रुप से इनसे भी ज्यादा लोग रोजगार शून्य हो चुके। परोक्ष रुप से सबसे अधिक कपड़ा, जूता, लोहा, लकड़ी, मिष्ठान विक्रेता, घरों और दुकानों पर काम करने वाले, होटल, ढाबों वाले तथा वहां काम करने वाले मजदूर, कारीगर, ट्रांसपोर्टर तथा वहां सेवारत ड्राइवर और मजदूर, ऑटो रिक्शा चालक तथा निजि टैक्सी चालक, सब्जी और फल विक्रेता आदि हज़ारों परिवारों के कमाऊ सदस्य बेरोजगार हो गये हैं। यहां किराए पर मकान देकर अपना खर्च चलाने वाले भी काफी लोग हैं। उनके किराएदार या तो चले गये अथवा किराया देने में आनाकानी कर रहे हैं।

एक तरह से यहां की बड़ी आबादी घोर आर्थिक संकट में फंस गयी है। लॉकडाउन लंबा खिंचने की उम्मीद से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में समस्या विकराल रुप धारण करेगी। धनी लोग किसी तरह इस विपत्ति को झेल जायेंगे लेकिन आम आदमी ऐसे में बुरी तरह टूट जायेंगे। टूटने के कगार पर तो बहुत से लोग अभी पहुंच गये। कोरोना के कहर से भले ही ऐसे लोग बच जायें लेकिन आर्थिक संकट की मार उन्हें बख्श दे इसमें संदेह है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.