अर्थव्यवस्था के लिए किसानों-मजदूरों की जेबें भरनी होंगी

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जब तक गांव, गरीब और किसान तक पैसा नहीं पहुंचेगा तब तक कारोबार ठप्प रहेंगे.



दुनिया के तमाम चिकित्सक और विशेषज्ञ कोरोना मरीजों के उपचार और बीमारी की दवाई की खोज में जुटे हैं लेकिन मरीजों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। जांच की अपर्याप्त व्यवस्था के कारण कई देशों में जांच की धीमी गति से स्थिति और भी भयावह होने की संभावना है। चीन के बाद दुनिया का आबादी में सबसे बड़ा देश भारत इसका स्पष्ट प्रमाण है। जैसे-जैसे जांच की गति बढ़ाई गयी है, उसी तरह मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। इसी से पता चलता है कि जांच तेजी से नहीं की गयी तो भयावह परिणाम आने से इंकार नहीं किया जा सकता।

अमेरिका, इज़राइल, ब्रिटेन आदि में कोविड-19 की दवाई बनाने के कई अनुसंधान जारी हैं। हमारे देश में भी वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं लेकिन अभी वैक्सीन तैयार करने में सफलता नहीं मिली। हालांकि इज़राइल, अमेरिका तथा लंदन की कंपनियों ने दावा किया है कि उन्होंने वैक्सीन तैयार कर ली, उसका पशुओं पर परीक्षण कर लिया और मानव पर परीक्षण शुरु कर दिया है। एक कंपनी ने यहां तक दावा किया है कि उसने मानव पर पहला सफल परीक्षण किया है। दूसरे परीक्षण में संख्या दस गुणा बढ़ाकर परीक्षण किया जाना है। सफलता की पूरी उम्मीद है।

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दूसरी ओर कई विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ भी हो अभी वैक्सीन आने में कई महीने लग सकते हैं और वैश्विक आबादी के लिहाज से पर्याप्त टीकाकरण के लिए एक साल लग सकता है। तब तक बचाव ही एकमात्र उपाय है। इसके लिए हमारे देश में लंबे समय तक जारी लॉकडाउन से कई बड़ी समस्याओं से लोग जूझ रहे हैं। सबसे बड़ा संकट आजीविका के लिए खड़ा हो गया है। पूरे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी है। दो माह की लंबी देशव्यापी बंदी को धीरे-धीरे खोलकर कामकाज शुरु करने की कवायद शुरु की जा रही है। इससे हो सकता है, ध्वस्त अर्थव्यवस्था थोड़ी बहुत गति पकड़े, लेकिन इससे काम चलने वाला नहीं। पूरी तरह जेब खाली कर चुकी बड़ी आबादी बाजार से दूरी बनाने को मजबूर है। जब तक गांव, गरीब और किसान तक पैसा नहीं पहुंचेगा तब तक कारोबार ठप्प रहेंगे। ऐसे में खरीददारों की जेब तक धन पहुंचाने की जरुरत है।

-हरमिन्दर चहल.