पड़ौसियों से सतर्कता का समय

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मौजूदा परिस्थितियों में कम बोलने और ज्यादा विचारने की जरुरत है.

यह साल हमारे देश के लिए कई जटिल चुनौतियों को लेकर आया हैै। कोरोना जैसी महामारी तो दुनिया के तमाम देशों के लिए बहुत ही जटिल समस्या है। हमारे सामने इसके साथ कई दूसरे संकट भी उत्पन्न हो गये हैं। इस समय हमारे पड़ौसी देशों के संबंधों में गिरावट आयी है। केवल पाक ही नहीं बल्कि चीन, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश तक से रिश्तों में खटास बढ़ रही है। अफगानिस्तान में भारी भरकम निवेश के कारण फिलहाल सामान्य स्थिति है।

चीनी सामान का सबसे बड़ा बाज़ार होने के बावजूद हाल में सीमा पर खूनी भिड़ंत में हमारे सैनिकों को जिस तरह शहीद होना पड़ा उससे देश के प्रत्येक नागरिक को भारी दुख और रोष की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। चीन के मंसूबों को हमें समझने में भारी चूक हुई है। हमारी सरकार ने चीनी व्यापार के लिए देश के रास्ते खुले छोड़कर चीन को कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ा लिया। दवाईयों का रॉ-मैटीरियल (एपीआई), इलैक्ट्रोनिक तथा इलैक्ट्रिक सभी तरह के चीनी सामानों से हमारे बाजार भरे पड़े हैं। यह कोई कूटनीति नहीं बल्कि हमारी सरकार की नामसमझी है। 

पिछले छह वर्षों में चीन को हमारा निर्यात लगातार कम हुआ है जबकि चीनी सामान का आयात लगातार बढ़ रहा है। चीनी कंपनियों ने भारतीय कंपनियों को बरबाद करके रख दिया। चीनी सामान के बहिष्कार की खूब बातें हो रही हैं लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद ऐसे लोग सरकार से चीनी सामान आयात पर पाबंदी को दवाब नहीं देते। चीनी सामान आयेगा नहीं तो बिकेगा कहां से? आज स्थिति यह है कि भारत की कृपा से अस्तित्व में आया बांग्लादेश कई देशों को अपना सामान निर्यात कर रहा है। चीन ने उसके उत्पादों को शुल्क मुक्त कर अपने यहां तरजीह देनी शुरु कर दी है। वह हमसे आगे निकलता जा रहा है। 

आज चीन की शह पर नेपाल और बांग्लादेश जैसे देश भी भारत को आंख दिखा रहे हैं। श्रीलंका का झुकाव भी चीन की ओर है। इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों को दावतों पर आमंत्रित करने से काम नहीं चलने वाला है। मौजूदा परिस्थितियों में कम बोलने और ज्यादा विचारने की जरुरत है।

-जी.एस. चाहल.