मजदूर और कारोबार को अच्छे दिनों की आस

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प्रवासी मजदूरों की कहानी बेहद दुष्कर है। यह अर्थव्यवस्था के पहिये को झटका है.

लॉकडाउन ने ज़िन्दगी की गति को थाम दिया था। जहां सभी जगह कारोबार प्रभावित हुआ, वहीं मज़दूरों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। खासकर प्रवासी मज़दूरों के लिए यह किसी बुरे सदमे की तरह साबित हुआ। मज़दूर हज़ारों मील का सफर तय करने को मजबूर हुए हैं। उनके पास बताने को इतना कुछ है कि देश शर्मसार है। यह बहुत ही बुरा दौर है। इस दौरान मज़दूरों की दर्दनाक मौतों ने भी देश को हिला कर रख दिया है। आयेदिन मज़दूर हादसों का शिकार हुए हैं। कहा जाए तो कोविड-19 के फैलने से सबसे बड़ी आफत मज़दूरों पर आयी है। यह एक तरह से उन्हें जीते-जी मारने की तरह है। असल में भारत का मज़दूर तबका रोज मर रहा है। उनके पास रोजग़ार नहीं है। रोजग़ार नहीं तो दो वक्त की रोटी नहीं है। संकट बहुत बड़ा है जिसके परिणाम भविष्य में और भी भयावह होने जा रहे हैं।

प्रवासी मज़दूरों की डरावनी लेकिन सच्ची तस्वीरें जब आनी शुरु हुई्रं तो समूचा भारत दहल गया। भूखे-प्यासे, सिर पर गठरी का बोझ, साथ में रोते-बिलखते बच्चे, वाकई दिल झकझोर देने वाले हैं। उनका सफर आज भी जारी है। 

सरकार ने 1 मई को स्पेशल रेलगाड़ियां शुरु कीं, तो कुछ राहत मिली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनके पास जो जमा-पूंजी थी उसे उन्होंने साईकिल या अन्य आने-जाने वाले साधनों पर खर्च कर दिया था। यानी बहुतों की जेब बिल्कुल खाली थी। आगे कमाने के सभी रास्ते बंद थे। एक राह थी कि चलो अपने गांव चलो। वहीं जो मिलेगा उसी से गुजारा चला लेंगे। हालांकि सरकारी दावा कहता है कि उन्होंने लाखों की संख्या में मजदूरों को उनके घर पहुंचाया है और यह अब भी जारी है। लेकिन जो लोग अब भी पैदल चल रहे हैं, उनका क्या?

हर राज्य के पास अपनी बसें हैं। मगर मज़दूरों के लिए आगे आने में देर की गयी। यूपी रोडवेज ने बहुत समय बाद बसों को उपलब्ध कराया। 

ट्रेनों में गरीब मज़दूरों से पैसे लिए गये, ऐसे आरोप स्वयं मजदूरों ने टिकट दिखाकर लगाये। विपक्ष ने आरोप लगाये कि बड़े लोगों को विदेशों से हवाई जहाज में लाया गया, मज़दूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए सरकार सोती रही। 

संक्रमण के बुरे दौर में सरकारें नाकाम रहीं, यह किसी से छिपा नहीं। खासकर केन्द्र सरकार ने राज्यों पर पल्ला झाड़कर खुद को मजबूर साबित किया। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इच्छाशक्ति दिखाते हुए भाषण देने के बजाय मजदूरों की घर-वापसी के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए थे।

प्रवासी मजदूरों की कहानी बेहद दुष्कर है। यह अर्थव्यवस्था के पहिये को झटका है। भारत के लिए आने वाला वक्त बेहद चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है, यह मानना पड़ेगा। 

सरकार को चाहिए जल्द से जल्द ठोस रणनीति बनाए ताकि मजदूर और कारोबार को फिर से अच्छे दिनों की ओर ले जाया जा सके। उन्हें अच्छे दिनों की आस है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला (अमरोहा)