कोरोना काल में जोखिम रहित माहौल में जारी रह सकती है प्राथमिक शिक्षा

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इन सभी स्कूलों में अंदर और बाहर इतनी जगह है कि बच्चों को आसानी से दूर-दूर बैठाकर पढ़ाया जा सकता है.

यदि जिम्मेदार चाहें तो सूबे के परिषदीय स्कूलों की शिक्षा बिना जोखिम उठाए सुचारु रह सकती है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में छात्र-छात्राओं को कोरोना संकट में भी बिना जोखिम पढ़ाया जा सकता है। सरकार में बड़ी कुर्सियों पर विराजमान जिम्मेदारों को शिक्षा के प्रति समर्पित कई अध्यापक यह जानकारी भी देते आ रहे हैं। उनके पास यह कैसे संभव हो सकता है, का सटीक जमीनी उत्तर मौजूद है। फिर भी जिम्मेदार इस बारे में कोई विचार तक करने को तैयार नहीं।

हमारे प्रतिनिधि ने जनपद के शहरों से लेकर ग्रामांचलों तक कई स्कूलों का भ्रमण कर यह संभावना तलाशने की कोशिश की कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा स्कूलों में जारी कैसे रखी जा सकती है अथवा नहीं। जानकारी जुटाने से पता चला कि यह जारी रखी जा सकती है, बिना किसी झंझट, भारी बदलाव और जोखिम के बगैर।

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देखने में आया है कि चन्द स्कूलों को छोड़ अधिकांश परिषदीय स्कूलों में दस-बारह से लेकर पचास-साठ तक ही बच्चे हैं। कहीं-कहीं सौ अथवा उससे अधिक बच्चों की सूची भी है। यदि ईमानदारी से जांच की जाए तो कुछ स्कूलों में ऐसे नाम दर्ज हैं जो बच्चे स्कूलों में कभी नहीं आते यानी फर्जी नाम भी दर्ज हैं। जबकि तीन-चार बच्चों के स्कूल में होने की खबरें भी आती रहती हैं।


इन सभी स्कूलों में अंदर और बाहर इतनी जगह है कि बच्चों को आसानी से दूर-दूर बैठाकर पढ़ाया जा सकता है। दस-दस या पांच-पांच बच्चे मुश्किल से एक कक्षा की औसत संख्या बल्कि कहीं-कहीं इससे भी थोड़े बच्चे हैं। इन्हें एक साथ पढ़ाने में कोई खतरा दिखाई नहीं देता। स्कूलों में मास्क और सेनिटाइज़र का उचित प्रबंध होना जरुरी कर दिया जाए। यह कोई कठिन काम नहीं है।

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जब अध्यापकों को लगातार स्कूल भेजा जा रहा है तो बच्चों को पढ़ाने में उन्हें क्या परेशानी है। उन्हें पढ़ाने के लिए ही नियुक्त किया गया है।

कई अध्यापकों ने हमें इस तरह के सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में लगभग सभी बच्चे निर्धन परिवारों से हैं। उन्हें जानबूझकर शिक्षा से वंचित रखना बहुत ही अन्यायपूर्ण है। कोरोना के संक्रमण का खतरा उपरोक्त वजहों से होने का सवाल ही खड़ा नहीं होता। लिहाजा इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ने के लिए बुलवाया जाए।

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प्राथमिक स्कूलों में जहां सत्तर-अस्सी बच्चे भी हैं यदि उन्हें पांचों कक्षाओं में अलग-अलग बैठाया जाए तब भी 15 बच्चों का औसत पड़ता है। एक रुम में यह संख्या काफी कम है। जबकि अधिकांश स्कूलों में 20-25 से नीचे की संख्या में ही बच्चे हैं।

ज्यादातर स्कूल मोहल्ले तथा ग्राम सभा वार हैं। बच्चों को घर से दूर भी नहीं जाना पड़ता। मास्क लगाकर घर से निकलें और उसी तरह वापस लौटें। बाकी सभी सावधानियां शिक्षक स्वयं बरतने का ध्यान रखेंगे।

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अधिकारियों को निर्धन बच्चों की शिक्षा को अकारण बंद रखने के बजाय सरकार को उचित परामर्श देकर उसे चालू कराया जाए। अपने विवेक और प्राप्त उच्च शिक्षा का सदुपयोग कर सरकार तक उचित राय पहुंचाये तो बेहतर होगा।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.