नौगांवा सादात विधानसभा उपचुनाव : भाजपा के सामने सीट बचाए रखने की चुनौती

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इस बार भाजपा से कोई भी आए लेकिन सीट जीतना भाजपा के लिए कठिन चुनौती होगा.

जनपद की रिक्त विधानसभा सीट नौगांवा सादात के उप चुनाव की तैयारी की खबर से राजनीतिक हलकों में हलचल शुरू हो गई है। इस सीट से विधायक चेतन चौहान का 16 अगस्त को कोरोना संक्रमण से निधन हो गया था। इसके बाद चुनाव आयोग ने उप चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनावों के साथ ही इस तरह की रिक्त सीटों पर भी उपचुनाव होंगे।

चुनावी तैयारी की भनक से क्षेत्रीय नेताओं के कान खड़े हो गए हैं। कार्यकर्ताओं में उम्मीदवारों की चर्चाएं होने लगी हैं। केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की रिकॉर्ड बहुमत की सरकारों के कारण भाजपा उम्मीदवारों के कयास लगने शुरू हो गए हैं। कई नेताओं ने उम्मीदवारी की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं।

भाजपा कार्यकर्ताओं में अलग-अलग धारणाएं हैं और सीट जीतने के लिए भी अपने-अपने तर्क हैं। कुल मिलाकर जातीय समीकरणों को आधार बनाकर ही टिकट का फैसला होगा। यह अधिकांश  लोगों का मानना है कि इस बार भाजपा से कोई भी आए लेकिन सीट जीतना भाजपा के लिए कठिन चुनौती होगा। यह सभी पक्ष मानकर चल रहे हैं कि मुकाबला 2017 के चुनाव की तरह भाजपा और सपा में ही होगा। 2017 में यहां से सपा, भाजपा, बसपा और रालोद में चतुष्कोणीय मुकाबला था। हालांकि कांग्रेस और राकिमसं ने भी उम्मीदवार उतारे थे जो नाम मात्र के वोट ही हासिल कर पाए। मुख्य टक्कर तब भी भाजपा और सपा में थी।

उपचुनाव के लिए भाजपा को सबसे अधिक माथापच्ची करनी पड़ेगी। इस सीट पर मुस्लिम, चौहान, जाट और दलित चार बड़े वोट समूह हैं। बीते दो लोकसभा तथा एक विधानसभा चुनावों में जहां मुस्लिम  मतदाताओं ने भाजपा के प्रमुख प्रतिद्वंदी उम्मीदवार को मत दिया। वहीं चौहान और जाट मतदाताओं ने एकजुटता के साथ भाजपा के पक्ष में मतदान किया। दलित मतदाताओं में से अधिकांश बसपा के साथ रहे जबकि कुछ मतदाताओं ने भाजपा का साथ दिया।

जो लोग इस बार सपा को यहां मजबूत करार दे रहे हैं उनका तर्क है कि किसान और मजदूर वर्ग भाजपा की आर्थिक नीतियों से परेशान हैं। आए दिन किसान संगठन दिक्कतों को लेकर धरने और प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। मनरेगा में जारी धांधली को कोई सुनने वाला दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में लोग सपा के साथ जुड़ रहे हैं।

यहां जातीय समीकरण साधने में भाजपा माथापच्ची में जुटी है। कुछ लोगों का मानना है कि जब चेतन चौहान को टिकट दिया गया था तब कई जाट तथा एक अन्य चौहान भी दावेदार थे। जिले में भाजपा को भरपूर समर्थन के बावजूद यहां से किसी भी जाट को विधानसभा उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इस बार उनमें से भी कोई ना कोई दावा ठोक सकता है लेकिन डॉक्टर हरिसिंह ढिल्लों को एमएलसी उम्मीदवार बनाना और जिलाध्यक्ष पद भी जाट को दिए जाने से जाटों का दावा कमजोर रहेगा।

राहुल चौहान का दावा कुछ लोग मजबूत मान रहे हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि चेतन चौहान के निधन से रिक्त स्थान उनकी बिरादरी को मिलना चाहिए। जबकि कई चेतन चौहान के परिवार के किसी सदस्य को सहानुभूति के तौर पर लाना चाहते हैं। यदि ऐसा होता है तो इससे चौहान मतों में भी फूट पड़ सकती है। राहुल चौहान समर्थक इससे नाराज होकर बाहरी का विरोध कर सकते हैं। सपा सूत्रों से यह भी पता चला है कि वह सपा के पूर्व मंत्री और गढ़ विधायक मदन चौहान को मैदान में लाना चाहते हैं। सपा के परंपरागत मुस्लिम तथा यादव मतों के साथ यहां चौहान मतों में बड़ी घुसपैठ का यह कारगर उपाय होगा। जिससे सपा भाजपा पर बढ़त बनाने में सफल हो सकती है।

भाजपा का एक बड़ा वर्ग पूर्व सांसद देवेंद्र नागपाल को मैदान में लाना चाहता है। उनका तर्क है कि चेतन चौहान को देवेंद्र नागपाल ने संसदीय चुनाव में हराया था और उनके भाई हरीश नागपाल ने निर्दलीय होते हुए भी हराया। नागपाल चेतन के सामने मजबूत जनमत प्राप्त नेता रहे हैं। नागपाल समर्थक मानते हैं कि नौगांवा सादात से यदि उन्हें मैदान में उतारा गया तो वे पिछले चुनाव से बड़ी जीत भाजपा को दिला सकते हैं।

हालांकि बसपा अभी खामोश है लेकिन इस क्षेत्र में बसपा का जनाधार कम हुआ है। फिर भी उसके द्वारा मैदान में उतारा गया उम्मीदवार भाजपा-सपा के परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करेगा। रालोद पहले से बेहतर स्थिति में जरूर है लेकिन विजय की संभावना दूर तक भी नहीं।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.