जरुरत से कम उपलब्ध किताबों की वजह से छपी नकली किताबें

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सवालों के घेरे में एनसीईआरटी भी आनी चाहिए. 8.64 करोड़ की मांग के सापेक्ष 3 करोड़ पुस्तकें ही क्यों छापी गयीं?

राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नकली किताबों के मेरठ और गजरौला में पकड़े जखीरे और उन्हें छापने वाले भाजपा नेता संजीव गुप्ता और सचिन गुप्ता अभी पुलिस की पकड़े से बाहर हैं। कारण कुछ भी हो लेकिन कहा जा रहा है कि उन्हें बचाने के लिए मेरठ के बड़े भाजपा नेता सक्रिय हैं। संजीव गुप्ता को जिला उपाध्यक्ष पद और पार्टी से हटाकर भाजपा अपना दामन साफ दिखाने की कोशिश में है। 

इस हकीकत का पता चलने में अभी लंबा समय लगेगा कि नकली किताबों के फर्जीवाड़े के पीछे गुप्ता चाचा-भतीजे के अलावा और कौन-कौन हैं? सवालों के घेरे में एनसीईआरटी भी आनी चाहिए क्योंकि 8.64 करोड़ की मांग के सापेक्ष केवल तीन करोड़ पुस्तकें ही क्यों छापी गयीं? इसी से फर्जीवाड़े का मार्ग खुलता है। 

मेरठ और गजरौला की पुलिस की कार्यप्रणाली भी इससे शक के घेरे में आती है। वर्षों से जारी इस अवैध पुस्तक प्रकाशन का उसे पता न चलना स्वतः ही इस ओर इशारा करता है। एलआइयू जैसी स्थानीय खुफिया इकाइयों की भी इसमें नाकामी मानी जानी चाहिए। ऐसे में यह और भी चिंताजनक है कि गजरौला की औद्योगिक क्षेत्र की पुलिस चौकी के निकट ही यह अवैध छापाखाना ट्रकों पुस्तकें छापकर बाजार में खपा रहा था। 

मेरठ और गजरौला की पुलिस को तब तक पता नहीं चला जब तक केन्द्र से भेजी एसटीएफ की टीम ने गजरौला की फैक्ट्री पर छापा नहीं मारा। यह कार्रवाई मेरठ के सेना अधिकारियों की सूचना पर की गई। उनकी केन्टीन पर भी फर्जी प्रकाशन पुस्तकें बेचने में सफल हुए। कुछ बच्चों की पुस्तकों पर सेना अधिकारियों को सन्देह होने पर केन्द्रीय स्तर पर सूचना दी गई थी। इससे पता चलता है कि यदि सेना को पता न चलता तो यह फर्जीवाड़ा अभी कब तक जारी रहता और फर्जीवाड़ा करने से देश के राजस्व का कितना हिस्सा गटक चुके होते। 

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एनसीईआरटी के अधिकारियों को पता होना चाहिए कि सीबीएसई से मान्यता प्राप्त कितने स्कूल हैं और उनमें कितने छात्र पढ़ रहे हैं। अकेले मेरठ शहर में ही 8.64 करोड़ किताबों की जरुरत है जिनमें एनसीइआरटी की केवल 3 करोड़ किताबें भेजी गयीं, बाकी 5.64 करोड़ नकली किताबें खप गईं। ऐसे में पूरे उत्तर प्रदेश में कितनी नकली किताबें खपाई जा रही हैं। किताबों की कमी के कारण नकली किताबें छप रही थीं। अभी तक मुख्य सौदागर हाथ नहीं आए। उनके पकड़े जाने से बड़ा खुलासा होगा। गजरौला की तरह और भी कहीं उनके फर्जी प्रेस हो सकते हैं। गजरौला में पहले भी कई ऐसे प्रकरण प्रकाश में आए हैं जहां बंद पड़ी इकाई, प्लाट में अवैध रुप से नकली माल बनते पकड़ा गया है। जिस फैक्ट्री में नकली पुस्तकें मिली हैं, इससे चंद कदम दूर पश्चित में स्थित एक चावल मिल में एक दशक से पूर्व नकली सामान बनाने का अवैध कारोबार पकड़ा गया था। शहवाजपुर डोर गांव जो यहां से करीब है। वहां नेशनल हाइवे के किनारे सीमेंट बनाने की अवैध फैक्ट्री पकड़ी गई थी। यहां कई फैक्ट्रियाँ बंद पड़ी हैं। कुछ के निर्माण को तोड़ दिया गया जबकि कई कार्यशाला आदि के निर्मित खंडहरों की शक्ल में मौजूद हैं। इनपर पुलिस की नज़र होनी चाहिए। नकली पुस्तकों वाली जगह में पहले कीटनाशक बनाने की फैक्ट्री थी जिसे बंद कर  मालिकों ने जगह किराए पर दे दी थी।

-जी.एस. चाहल.