आबादी नियंत्रण में देरी घातक

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आरएसएस और मोदी सरकार की मंशा है लेकिन वे नहीं समझ पा रहे कि यह कैसे किया जाये?

हाल ही में दो बच्चों का मुद्दा एक बार फिर उछला है। भाजपा नेता संजीव बालियान भी इस दिशा में मुखर हुए लेकिन बाद में खामोश हो गए। सोशल मीडिया में यह मामला छा रहा है। लोग देश की तेजी से बढ़ती आबादी पर अंकुश के समर्थन में दिखाई पड़ रहे हैं। कुछ लोग अभी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। जनसंख्या नियंत्रण के लिए कुछ संगठन तैयार हुए हैं। वे समय-समय पर लोगों को जागरुक कर आबादी पर काबू करने के लिए काम कर रहे हैं।

यह सभी जानते हैं कि भारत दुनिया में सबसे तेज आबादी बढ़ाने वाला देश बन गया है। हमारा पड़ौसी चीन आबादी में हमसे बहुत आगे था लेकिन उसने आबादी काबू में की और आज वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रुप में उभर रहा है। इसके विपरीत हम अधिकांश मोरचों पर पीछे खिसक रहे हैं। हमारी आर्थिक बुनियाद मजबूत होने के बजाय कमजोर होती जा रही है।

समस्यायें बहुत हैं। उनका समाधान हम सभी को निकालना है। सबसे बड़ी यानी समस्याओं की जड़ बढ़ती आबादी है। बिना देर किए आबादी की गति को धीमी करना होगा। जो लोग पंचायत चुनावों के लिए दो बच्चों से अधिक बच्चों वालों को अयोग्य करार देने की बात कर रहे हैं, वे कहीं तक तर्क संगत हैं लेकिन इससे काम नहीं चलने वाला। यह नियम अथवा शर्त सभी तरह के चुनावों यानी सबसे छोटी पंचायत ग्राम पंचायत से लेकर सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद तक लागू होनी चाहिए। यही नहीं सरकारी सेवाओं से लेकर लिमिटेड कंपनियों तक में लागू हो तो बात बन सकती है। इसके लिए बड़ी तैयारी की जरुरत है। यह काम कह देने भर से नहीं होने वाला। बड़ी इच्छाशक्ति वाली सरकार इसके लिए सोच सकती है। इसे लागू करने से सरकारों को भी दांव पर लगाना पड़ सकता है। यही वजह है कि कोई भी सरकार इस विषय पर गंभीर नहीं दिखाई देती। हालांकि आरएसएस और मोदी सरकार की मंशा है कि कम बच्चों वाली नीति लागू हो लेकिन वे नहीं समझ पा रहे कि यह कैसे किया जाये? इसपर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। उसके बाद नीति तैयार हो तो बेहतर होगा। लेकिन इसमें जितनी देर हो रही है, समस्यायें उतनी ही जटिल होती जायेंगी। 

-जी.एस. चाहल.