नौगांवा में नागपाल पर दांव लगाये भाजपा तो सीट बच सकती है, संगीता चौहान मुकाबला नहीं कर पायेंगी विरोधियों का

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भाजपा को ऐसे उम्मीदवार की दरकार है जो सभी वर्गों को जोड़कर उनका समर्थन हासिल करने की क्षमता रखता है.

नौगांवा सादात विधानसभा सीट के उपचुनाव के लिए प्रमुख दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। यह सीट भाजपा के कब्जे में थी इसलिए इसे बचाये रखने के लिए वह एड़ी चोटी का जोर लगायेगी। अभी तक उम्मीदवार का नाम सामने न आने की मुख्य वजह यही है कि खूब ठोक-बजाकर देखने और तमाम बिन्दुओं पर मंथन के बाद ही किसी मजबूत कार्यकर्ता को मैदान में उतारा जायेगा।

बसपा अपना उम्मीदवार फुरकान अहमद को घोषित कर चुकी। सपा अभी उम्मीदवार घोषित नहीं कर सकी। सूत्रों से पता चला है कि सपा-रालोद मिलकर उम्मीदवार उतारना चाहते हैं। अभी यह नहीं फाइनल हो पा रहा कि सीट किस पार्टी के खाते में जाये। सात सीटों पर उपचुनाव होना है जिसमें रालोद नौगांवा सीट मांग रही है। रालोद नेताओं का कहना है कि वे शेष छह सीटों पर सपा का समर्थन करेंगे। यह इन दोनों दलों का मामला है। फिर भी यहां समझौते से भाजपा के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। कृषि बिलों को लेकर किसान खासकर जाट, यादव, गुर्जर तथा सैनी मतदाता भाजपा से नाराज हैं। पिछले चुनावों में ये सभी भाजपा के साथ थे, इस बार इनमें से बड़ी संख्या भाजपा के खिलाफ जा सकती है।

भाजपा के स्थानीय नेताओं से बात करने पर पता चला है कि यहां दो नामों में से किसी एक को उम्मीदवार बनाये जाने के कयास लगाये जा रहे हैं। पूर्व सांसद देवेन्द्र नागपाल और चेतन चौहान की पत्नी संगीता चौहान।

 क्षेत्रीय कार्यकर्ता इन दोनों में देवेन्द्र नागपाल को अधिक मजबूत बता रहे हैं। संगीता चौहान इस क्षेत्र के लिए एकदम अपरिचित हैं। वे एक राष्ट्रीय बैंक की महाप्रबंधक पद पर रही हैं। उच्च अधिकारी आम आदमी के कम ही संपर्क में रहते हैं। वे आदेशात्मक व्यवहार के आदी हो चुके होते हैं। जबकि राजनीति में चुनाव जीतने के लिए नेता जनता के बीच याचक की भूमिका में पहुंचते हैं। आजाद भारत के इतिहास में कई नेता नौकरशाही से राजनीति में जरुर आए लेकिन उनमें से एक-दो को अपवाद मानते हुए सभी को पिछले दरवाजे से नामित कर राजनीति में प्रवेश कराया गया। वे चुनाव में जनता द्वारा नहीं चुने जा सके। ऐसे में संगीता चौहान का वृद्धावस्था में चुनावी दंगल में उतरने का कोई औचित्य नहीं बनता।

बताया जाता है कि 2015 के चुनाव में भी नौगांवा से देवेन्द्र नागपाल को टिकट मिलना फाइनल हो चुका था लेकिन तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली के हस्तक्षेप से चेतन चौहान को उम्मीदवार बनाया गया। यह भी सभी जानते हैं कि पूरे जनपद के तमाम भाजपा नेताओं के प्रयास और भाजपा की आंधी में सपा ने उन्हें जबरदस्त टक्कर दी थी। चेतन चौहान को जिले से जीते तीनों विधायकों में सबसे कम अंतर से विजय मिली थी।

 2015 से 2020 तक समय बदल चुका है। ताजा कानूनों के बाद किसानों की सोच भी परिवर्तित हुई है। उधर सपा-रालोद गठबंधन का भी प्रभाव है। ऐसे में भाजपा के लिए यह सीट बरकरार रखनी आसान नहीं होगी और संगीता चौहान के बूते तो बिल्कुल भी नहीं।

रही बात देवेन्द्र नागपाल की, तो इस नेता में लोगों को जोड़ने की क्षमता का अब तक इतिहास रहा है। वे विधानसभा का निर्दलीय होते हुए चुनाव जीते। उसी दौरान अपने बड़े भाई हरीश नागपाल को चेतन चौहान के सामने संसदीय चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में उतारकर विजयी बनवाया। यही नहीं उनका कार्यकाल समाप्त होते ही उन्होंने फिर से संसदीय चुनाव में विजय हासिल की। वे भाजपा-रालोद के संयुक्त उम्मीदवार थे।

इस बार नौगांवा सादात से भाजपा को ऐसे उम्मीदवार की दरकार है जो सभी वर्गों को जोड़कर उनका समर्थन हासिल करने की क्षमता रखता है। यह क्षमता इस समय के भाजपा नेताओं में देवेन्द्र नागपाल में है।

-टाइम्स न्यूज़ नौगावां सादात.