कृषि बिलों पर फंस गयी केन्द्र सरकार, आगे कुंआ पीछे खाई

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जहां पूरे देश के सामने नया संकट खड़ा होगा वहीं केन्द्र सरकार भी उससे अछूती नहीं रहेगी.

किसानों कृषि कानूनों को लेकर देश में जो स्थिति है, उसके समाधान में जितनी भी देरी की जायेगी, उससे जहां पूरे देश के सामने नया संकट खड़ा होगा वहीं केन्द्र सरकार भी उससे अछूती नहीं रहेगी। इस संकट का सबसे सरल उपाय था, फिलहाल केन्द्र कृषि कानूनों को तुरंत रद्द कर स्थिति सामान्य करती और कोरोना की स्थिति से निपटने के बाद इन कानूनों पर पुनर्विचार कर संसद में पेश करती।

इस समय हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र के किसान एकजुट चुके हैं तथा इन कानूनों को रद्द कराने पर तुले हुए हैं। यही नहीं देश का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट संगठन, कई वकील संगठन, अनेक सामाजिक संगठन,​ खिलाड़ी, कलाकार तथा आढती संगठन भी किसानों का खुलकर समर्थन करने निकल पड़े हैं। लगभग सभी मजदूर संगठन भी अन्नदाता की मांगों के लिए उनके साथ हैं। हालांकि किसान किसी भी दल को मंच साझा करने की इजाजत नहीं दे रहे। केन्द्र सरकार के मंत्री और प्रवक्ता बार-बार विपक्ष पर राजनीति करने के आरोप के साथ किसानों को भ्रमित करने का दोषारोपण कर कानूनों को किसानों का हितैषी बताने की दलीलें दे रहे हैं।

दिल्ली घेरे बैठे किसानों में हजारों वृद्ध, महिला और बच्चे भी मौजूद हैं। कड़कड़ाती ठंड की परवाह किए बिना मोर्चे पर डटे किसानों के साहस से पता चलता है कि वे टस से मस होने वाले नहीं। दिल्ली आने जाने के मार्ग किसानों ने किसी भी धरना स्थल पर पूरी तरह अवरुद्ध नहीं किए बल्कि पुलिस प्रशासन द्वारा अधिकांश मार्गों को अवरोधक लगाकर इसलिए पूरी तरह बंद कर दिया है जिससे किसान दिल्ली में प्रवेश न कर सकें। जबकि कई टीवी चैनल रास्ता जाम करने का आरोप किसानों के सिर मंढ रहे हैं।

बिहार, बंगाल और अन्य राज्यों के किसान भी कृषि कानूनों के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तथा दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं। आदिवासी किसानों के गुट ने तो अर्द्धनग्न होकर कृषि कानूनों का विरोध किया है। यह अत्यंत सुखद और एतिहासिक है कि यह आंदोलन बिलकुल शांतिपूर्ण और व्यवस्थित चल रहा है। प्रमुख समाजसेवी योगेन्द्र यादव ने इसका श्रेय पंजाबी किसानों को देते हुए उनका आभारत जताया है। उन्होंने यह भी कहा है कि निंसेदह ये काले कानून हैं। इन्हें रद्द किया जाना देश और किसानों के हित में है।

लगता है कि केन्द्र सरकार की लापरवाही और उदासीनता ने जहां देश को संकट में डाल दिया। वहीं इससे उसके लिए आगे कुंआ पीछे खाई वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है। यदि वह कानून रद्द करने का फैसला लेती है, तो विपक्ष उसपर गलत फैसले लेकर दवाब में यूटर्न लेने वाली अयोग्य सरकार ठहराकर उसे बदनाम करेगा। यदि वह उन्हें वापस नहीं लेती तो उसके खिलाफ पूरे देश के किसानों में जो वातावरण है वह विकराल रुप धारण कर सकता है। इससे देश की कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है। कोविड महामारी और देश की सीमाओं पर बढ़ते तनाव के बीच देश में बढ़ रहे जनाक्रोश को बल प्रयोग के द्वारा दबाने की नीति पर विचार करना भी बड़े खतरे को जानबूझकर मोल लेना होगा। सबसे सरल उपाय यही है कि सरकार को कृषि बिलों को तत्काल रद्द कर किसान आंदोलन पर विराम लगा देना चाहिए। इस विषय को माकूल समय पर फिर से लाया जाये तो बेहतर होगा। इससे किसानों की सरकार के प्रति नाराजगी तो खत्म होगी बल्कि विपक्ष को मिल रहे पैर जमाने के मौके पर भी सटीक वार होगा। कृषि कानूनों पर सफाई देने से इसलिए बात नहीं बनने वाली कि किसानों ने उन्हें अच्छी तरह पढ़ा और समझा है। किसानों को नासमझ या कम पढ़े लिखे कहने की गलती को भी सरकार के मंत्री और प्रवक्ता सुधारें। किसान देश के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से अधिक पढ़े लिखे हैं। किसानों के अनेक बेटे आइएएस हैं।

-जी.एस. चाहल.