कहीं खो गयी है होली की मदमस्त रंगत

होली-की-मदमस्त-रंगत

शहरों में तो होली बिल्कुल बदरंग रही जबकि देहाती क्षेत्रों में भी कोरोना की वजह से निराशाजनक स्थिति है.

हमारे देश में त्योहारों की पुरातन परंपरा है। थोड़े-बहुत बदलावों के साथ इन त्योहारों को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली ऐसे त्योहारों में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। सनातनी परंपराओं में दीपावली और होली सबसे बड़े त्योहार हैं जो विभिन्न रुपों में दुनियाभर में धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं।

होली खासतौर से रंगों का त्योहार है। दरअसल बसंती मौसम में चारों ओर मदमस्त सुगंध का अहसास होता है। आम्र मंजरी, सरसों के फूल, नाशपाती, चकोतरा, कचनार तथा नींबू आदि के फलों से पूरा वातावरण एक भीनी सुगंध से महक उठता है। शहरी वातावरण से दूर ग्रामांचलों में ऐसा ही वातावरण होता है। आधुनिकता की दौड़ में यह वातावरण और दृश्य धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।

फागुन के आगमन के साथ ही पहले रातभर ढोलों और बम बड़ा नगाड़ा की थापों पर नाच-कूद करते और आनंद के साथ होली गाते थे। जब गांव से दूर खेतों में रात को फसलों की सिंचाई आदि करते थे तो यह गूंज वहां बहुत ही कर्णप्रिय लगती थी। मन में एक नया जोश और उमंग उत्पन्न हो उठते थे। आधी रात तक लोग होली और ढोल आदि बजाते रहते थे।

अब समय तेजी से बदल रहा है। यह पता ही नहीं चलता कि फागुन कब आया और कब चला गया अथवा आया भी या नहीं। पुरानी कहावत थी, मस्त महीना फागुन का, जो बदल कर हो गयी है -'मस्त महीना फागुन का।' लोग एक दिन रंग की औपचारिकता निभा कर होली मनाने की परंपरा को ढोने का प्रयास करते हैं।

इधर होली के रंग को इस बार कोरोना जैसी विश्वव्यापी बीमारी ने बदरंग कर दिया। गले मिलने की बात दूर लोग एक-दूसरे से दूर भागने को मजबूर हैं। इस बार शहरों में तो होली बिल्कुल बदरंग रही जबकि देहाती क्षेत्रों में भी कोरोना की वजह से निराशाजनक स्थिति है।

-जी.एस. चाहल.