कमलेश बीडीसी से जिला पंचायत तक हमेशा विजयी रही हैं

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जातीय आधार पर यहां बसपा का परंपरागत एससी वोट सबसे अधिक है.

जिला पंचायत चुनाव में सदस्यों की पहली सूची में बसपा ने जहां जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है, वहीं मजबूत जनाधार वाले जिताऊ उमीदवारों का चयन भी किया है। इनमें वार्ड 9 से पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कमलेश आर्य को उम्मीदवार बनाया है।

कमलेश आर्य बसपा की भाग्यशाली नेत्री हैं। वे अभी तक जितने भी चुनाव लड़ी हैं, हमेशा विजयी रही हैं। उन्होंने बीडीसी के चुनाव में रिकार्ड मतों से विजय हासिल करते हुए अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। क्षेत्र विकास समिति सदस्य का चुनाव जीतते ही वे गजरौला ब्लॉक की प्रमुख पद के लिए मैदान में आयीं और जबर्दस्त विजय हासिल कर ब्लॉक की पहली महिला ब्लॉक प्रमुख बनने का गौरव प्राप्त करने में सफल रहीं।

उनका यह सफर उसी गति से जारी रहा। उन्होंने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता और यही नहीं वे जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी जीत गयीं। उन्हें मध्यान्ह में बसपा के बाद सपा की सरकार राज्य में बनने के बावजूद शक्ति परीक्षण का भी सामना नहीं करना पड़ा और निर्विघ्न पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। इसमें उनके पति वरिष्ठ बसपा नेता हेम सिंह आर्य की राजनैतिक सूझबूझ और जमीनी स्तर पर लोगों के बीच गहरी पैठ का लाभ मिला। यह संभवत: उनका पांचवा चुनाव है, जो उनके पुराने विजयी इतिहास को एक बार फिर से दोहराने की ओर चल पड़ा है।

यहां उनके सामने भाजपा और सपा के उम्मीदवार नहीं आ पाये। यह अंक पाठकों के बीच पहुंचने तक हो सकता है वे सामने आ जायें। चुनावी आकलन तभी और सटीक उपलब्ध हो सकता है।

जातीय आधार पर यहां बसपा का परंपरागत एससी वोट सबसे अधिक है जबकि ओबीसी समुदाय दूसरा बड़ा वोट बैंक है जो विभाजित हैं। यहां एससी वोटों के सहारे ही पिछली बार बसपा उम्मीदवार विजयी रही थी। इस बार ओबीसी वर्ग के उम्मीदवार को बसपा ने वार्ड 8 से मैदान में उतारकर यहां एससी + ओबीसी समीकरण साधने का भरपूर प्रयास किया है। इसका लाभ कमलेश आर्य को मिल रहा है। राजनीति में उनका वजूद और हेम सिंह आर्य का संबंध उनकी मजबूती का एक और बड़ा कारण है।

फिर भी मतगणना से पूर्व कोई भी दावा संभव नहीं, केवल अटकलें ही लगायी जा सकती हैं। फिर भी कमलेश आर्य की मजबूती की कई ठोस वजहों को भी नहीं नकारा जा सकता।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.