रालोद की ताकत बढ़ना भाजपा के लिए चुनौती

रालोद की ताकत बढ़ना भाजपा

कृषि बिलों को लेकर जारी किसान आंदोलन का लाभ यहां रालोद के खाते में जा रहा है जिसका परोक्ष लाभ समाजवादी पार्टी को भी मिल रहा है। यही वजह है कि दोनों दलों की एकता मजबूत हो गयी है। भाजपा को इसका नुक्सान उठाना पड़ सकता है। जनपद के कई भाजपा नेता और उनके समर्थक स्थिति को भांप कर जहां रालोद में शामिल हो गये वहीं कुछ सपा में भी शामिल हुए हैं। यह तो समय बतायेगा कि इनके सहारे सपा-रालोद को कितना बल मिलेगा लेकिन भाजपा ने ऐसे लोगों को निजि स्वार्थों से प्रेरित होना बताया है।

पंचायत चुनावों के अवसर पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख पति कामेन्द्र सिंह ने भाजपा से जि.पं. सदस्य उम्मीदवार न बनाये जाने से नाराज होकर भाजपा छोड़ रालोद में शामिल होकर बतौर रालोद उम्मीदवार वार्ड-11 से चुनाव लड़ा लेकिन सफल नहीं हो सके। यहां से भाजपा भी हारी जबकि बसपा विजयी रही। कामेन्द्र सिंह ने भाजपा पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया था।

भाजपा के पूर्व विधायक तथा गजरौला नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष हरपाल सिंह ने भी जिला पंचायत चुनाव के बाद अपनी उपेक्षा से नाराज होकर भाजपा छोड़ रालोद का दामन थाम लिया। उनके साथ कई कार्यकर्ता भी रालोद में शामिल हुए। बताया जा रहा है कि वे सपा-रालोद गठबंधन से मंडी धनौरा वि.स. प्रत्याशी बनना चाहते हैं। हालांकि अभी यह तय नहीं कि जिले की चारों वि.स. सीटों में से सपा को कौन सी तथा रालोद के खाते में कौन सी सीट आयेगी। उधर पूर्व विधायक तथा पुराने रालोद नेता अशफाक खां नौगांवा सादात पर दावा ठोक रहे हैं। वैसे भी सपा जिले में एक सीट ही रालोद को देना चाहेगी।

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सरिता चौधरी के पति भूपेन्द्र सिंह भी जि.पं. चुनाव के बाद भाजपा को अलविदा कह रालोद में शामिल हो गये। उनके साथ भी कई कार्यकर्ता रालोद में शामिल हो गये। भूपेन्द्र सिंह ने पूर्व भाजपा सांसद कंवर सिंह तंवर पर उन्हें जि.पं. चुनाव हरवाने को दोषी करार देकर पार्टी छोड़ रालोद में जाने को मूल वजह बताया है। उन्होंने भाजपा को जाट और किसान विरोधी पार्टी बताया है। उधर पूर्व ब्लॉक प्रमुख पति धमेन्द्र सिंह लालू भाजपा छोड़ सपा में चले गये। भाजपा छोड़कर दूसरे दलों में गये नेताओं ने भले ही भाजपा में रहते हुए उपेक्षा का आरोप लगाया हो लेकिन भाजपा नेता यह नहीं मानते। वे ऐसे लोगों को पदलोलुप तथा स्वार्थी करार दे रहे हैं। साथ ही यह भी दावा कर रहे हैं कि जिस दल में ये लोग गए वहां रिक्तियों का पहले ही अभाव है।

वैसे हकीकत यह है कि सपा अमरोहा जनपद की चारों सीटों में से जहां तक संभव है नौगांवा सादात सीट को रालोद को दे सकती है। तीन सीटें वह अपने पास रखना चाहती है। धनौरा सीट को भी यदि वह रालोद को देती है तो यहां दोनों दल बराबर होंगे। यह भी संभव हो सकता है। क्योंकि यहां की चारों सीटों पर जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, नौगांवा और धनौरा दोनों जगह तो जाटों को साथ लिए बिना कोई भी पार्टी विजयी नहीं होगी। पिछली बार इन्होंने एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में मतदान किया था।

रालोद में भी कई जाट नेता नौगांवा से उम्मीदवारी की इच्छा रखते हैं। यहां से टिकट बंटवारे के बाद जाटों में गुटबंदी उभरने से कोई नहीं रोक सकता। भले ही यह सीट रालोद के खाते में चली जाए लेकिन यहां भी किसानों खासकर जाटों में कई गुट हैं जिनमें भाजपा, बसपा और रालोद में कई नेता हैं तथा भाकियू के भी कई गुट हैं। फिलहाल भाकियू के सभी गुट भाजपा के खिलाफ एकजुट हैं। यह देखना होगा चुनाव के मौके तक  उनकी एकता कायम रहती है या नहीं और वे किस-किस को अपना समर्थन देंगे।

भाजपा के जो नेता रालोद में गए हैं उनके पार्टी बदलने से जहां रालोद को बल मिला है और वह जनपद में काफी मजबूत भी हुआ है। दूसरी ओर भाजपा से इसे क्षति पहुंची है। यह आने वाला समय बतायेगा कि उसका परिणाम क्या होगा? 

बहरहाल चारों सीटों पर 2017 के मुकाबले भाजपा के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा।

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.