आधा गन्ना बिना भाव ही बिक गया, मिल और सरकार खामोश

आधा गन्ना बिना भाव ही बिक गया

प्रदेश के किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा। प्रदेशभर में जगह-जगह किसान कड़ाके की ठंड में धरने व प्रदर्शन कर समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं। आये दिन विभिन्न किसान संगठन अधिकारियों को सरकार के लिए ज्ञापन और मांग पत्र दे रहे हैं। समस्याओं से जूझ रहे अन्नदाता डबल इंजन की सरकार से अब अधिक उम्मीद नहीं पाल रहे। दो माह से किसानों का गन्ना चीनी मिलों पर बिना भाव के बिक रहा है। सरकार अभी तक उसका मूल्य तय नहीं कर पायी। अधिक से अधिक तीन माह मिल और चल पायेंगे। कई क्षेत्रों में तो गन्ना आधा बिक चुका। किसानों का कहना है कि दो माह में गन्ना निपट जायेगा। इस बार फसल कमजोर है, बहुत से खेतों में गत वर्ष से आधा उत्पादन हो रहा है।

कई मिलें पिछले साल के मूल्य पर भुगतान कर रही हैं। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार और मिल मालिक मूल्य बढ़ाना नहीं चाहते इसीलिए राज्य सरकार मौन साधे पड़ी है। किसानों का कहना है कि गन्ना उत्पादन सहित सभी फसलों का उत्पादन खर्च बढ़ता जा रहा है। खेत की जुताई, बुवाई और सिंचाई का खर्च हर साल बढ़ रहा है। उर्वरक, बीज, कीटनाशक तथा मजदूरी सभी महंगे हो गये। ऐसे में गन्ना पिछले मूल्य पर बेचने में किसान की आय घट गयी जबकि डबल इंजन सरकार दावे कर रही है कि वह किसानों की आय बढ़ा रही है। तमाम किसान संगठनों के नेता आये दिन किसानों के साथ उनकी दिक्कतों को लेकर तहसीलों, जिला मुख्यालयों, बिजली घरों आदि पर धरने प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार उनकी रत्तीभर सुनवाई करने को तैयार नहीं।

केवल गन्ना मूल्य निर्धारण ही उनकी समस्या नहीं बल्कि किसान अनेक गंभीर समस्याओं के शिकार हैं। कड़ाके की ठंड में खेतों में रात को पानी चलाना खतरनाक है। वे बार-बार मांग कर रहे हैं कि उन्हें दिन में 8-10 घंटे बिजली दें। रात में बिजली न दें लेकिन यह भी सरकार को गवारा नहीं। बिजलीघरों पर धरने प्रदर्शन बेकार की बात हो गये हैं।

छुट्टा पशुओं के समूह खड़ी फसलों को तबाह कर रहे हैं। खेतों की रखवाली करते समय इस तरह के पशुओं द्वारा कई किसानों की जान लेने की घटनायें हुई हैं जिनका सिलसिला जारी है। इस समय गेहूं, बरसीम, सरसों तथा जई की फसलें इन पशुओं के निशाने पर हैं। सरकार द्वारा स्थापित गौशालाओं में पर्याप्त प्रबंध न होने की वजह से सारे पशुओं को संरक्षण नहीं दिया जा रहा। सरकार द्वारा जारी इस योजना को सुचारु रख पाने में अब राज्य सरकार भी असमर्थ जान पड़ती है। मुख्यमंत्री योगी जी कह रहे हैं कि जनता और सामाजिक संगठन इसमें सहयोग करें। जिला प्रशासन चारा आदि स्टोर करके रखें। इसके लिए स्थानीय दानदाताओं की सेवायें लें। पशुओं के गोबर, मूत्र और दूध के जरिये धन एकत्र कर उसे गौशालाओं के उपयोग में लायें। कुछ भी कहा जाये छुट्टा पशु किसानों के लिए एक बड़ा संकट बनते जा रहे हैं।

ग्रामांचलों में स्थापित सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र और प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति बद से बदतर है। अस्पतालों में चिकित्सक और दवायें उपलब्ध नहीं। कई जगह लंबे समय से चिकित्सालय बंद पड़े हैं। शिक्षा का निम्न स्तर होने की वजह से किसान और दूसरे गांववाले बच्चों को इन स्कूलों में भेजना नहीं चाहते।

गेहूं की बुवाई उर्वरक समय न मिलने के कारण पिछड़ गयी। इससे किसानों को कई जगह महंगे दामों में खाद खरीदना पड़ा। कुछ किसानों को पर्याप्त खाद नहीं मिला। एक माह देर से बोई गेहूं की वजह से उत्पादन गिरना तय है। किसानों को एक-दो कट्टे खाद के लिए भूखे-प्यासे लाइनों में दिनभर खड़ा होना पड़ा है। मध्यप्रदेश में यह दिक्कत उत्तर प्रदेश से भी ज्यादा रही।

किसान सम्मान निधि सभी पात्र किसानों को नहीं मिल रही। लेखपालों और कृषि विभाग के अधिकारियों की मनमानी तथा केन्द्र द्वारा बार-बार नये-नये दिशा-निर्देशों के कारण अनेक किसानों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है। कहने को 12 किश्तें जारी कर दी गयीं लेकिन लाखों किसानों को बिल्कुल भी नहीं मिलीं जबकि 2 य 3 किश्तें पाने वाले किसानों की भी बड़ी तादाद है।

किसानों की दिक्कतों की बहुत लंबी फेहरिस्त है। जिनके समाधान की मांग किसानों द्वारा लगातार जारी है। न तो सरकारी अधिकारी और न ही सरकार इस ओर ध्यान दे रहे हैं। किसानों की आवाज उठाने वाले संगठनों की प्रदेश में भरमार है। महेन्द्र सिंह टिकैत द्वारा जिस प्रकार एकजुट कर उनके अधिकारों के लिए लड़ने को तैयार किया है। उस आंदोलन की एकता टूटकर कई संगठनों में बदल गयी।

पिछले साल ये संगठन एकजुट हुए तो किसानों की ताकत से केन्द्र सरकार भी परिचित हुई थी लेकिन चुनाव के दौरान संगठनों में फूट पड़ गयी। इन्हें एकजुट करने की कोशिशें हैं। ये फिर से एकजुट हुए तो सरकार उनकी दिक्कतों का हल निकालने को मजबूर हो सकती है। यदि एकता नहीं हुई, तो किसान कितना ही चीत्कार करे डबल इंजन सरकार उनकी सुध लेने वाली नहीं।

-जी.एस. चाहल.